एक ऐसी बारिश देखि हमने ,
एक ऐसी बारिश महेसुस की ....
बारिश तो वही थी ,
सिर्फ़ बुँदे आंसुओं की थी ...
ऐसा लगा , आंसू उधर दे गया हो कोई ,
सारे गम लूटने को ...
सारी यादें मिटने को ...
सुना था भिगोती है बारिश ,
दुनिया के महेफिलों को ...
यहाँ तो ख़ुद भीगी है बारिश ,
भिगोके हमारे अरमानो और सपनो को ..
हमने हर एक आंसू परख के देखा ..
हर एक आंसू हस रहा था मेरी और अपनी किस्मत पे ..
ना तो वो ख़ुद अपना था , ना पुरा मेरा ....
उसमे तो मिला था उसका भी उधास चेहरा ..
जो रो रहा था मेरी और अपनी किस्मत पे ..
क्यों देता है खुदा ऐसी ....
बारिश बन्दों को ,
क्यूँ मिलाता है उनको ,
जिनके मुक्कद्दर में ऐसी बारिश हो ..
शायद सोचा हो उसने भी कुछ ...
भला अपने बन्दों का ...
अब सहेना ही पड़ेगा ...
और कहेना पड़ेगा ..
बारिश ही तो है ..
आंसुओं की ही सही.........!
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